कुंडली में राज योग, और वह सक्रिय कब होता है
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राज योग कुंडली में तब बनता है जब पहले, चौथे, सातवें या दसवें भाव का स्वामी और पहले, पाँचवें या नौवें भाव का स्वामी आपस में जुड़ जाएँ। दोनों एक साथ बैठ जाएँ, एक दूसरे को देखें, या एक दूसरे की राशि में चले जाएँ। परंपरा कहती है कि ऐसा संबंध जीवन में ऊपर उठने का संकेत देता है, और वह फल उन्हीं ग्रहों की दशा में मिलता है।
इस दूसरी बात पर ही सब कुछ टिका है, और यही बात इंटरनेट पर कहीं नहीं मिलती।
राज योग बनता कैसे है
पहला, चौथा, सातवाँ और दसवाँ भाव जीवन के सक्रिय हिस्से हैं, जो दिखते हैं। पहला, पाँचवाँ और नौवाँ भाव परंपरा में बुद्धि, पुण्य और भाग्य से जोड़े गए हैं। जब इन दोनों तरह के भावों के स्वामी आपस में संबंध बनाते हैं, तब यह योग बनता है।
संबंध चार तरह से बन सकता है। दोनों ग्रह एक ही भाव में बैठे हों। दोनों ने राशियाँ बदल ली हों, यानी हर एक दूसरे के घर में हो। दोनों एक दूसरे को दृष्टि से देख रहे हों। या एक ग्रह दूसरे के भाव में बैठा हो।
ग्रंथों में सबसे मज़बूत रूप नौवें और दसवें भाव के स्वामियों का मिलना माना गया है। बात सीधी है। जिस काम से आदमी कमाता है और जिस चीज़ में उसका भाग्य साथ देता है, वे दोनों एक ही हो जाते हैं।
कैलकुलेटर आपको कई राज योग क्यों गिना देता है
क्योंकि नियम को मशीन की तरह लगाया जाए तो बहुत कुछ पकड़ में आ जाता है। लग्न खुद केंद्र भी है और त्रिकोण भी, इसलिए लग्नेश लगभग किसी भी ग्रह के साथ आधा योग बना ही देता है। हर दृष्टि और हर परिवर्तन जोड़ दीजिए तो सूची लंबी हो जाती है।
जो सूची नहीं बताती, वही असली बात है।
- जो ग्रह यह योग बना रहे हैं, वे खुद कितने सक्षम हैं। कमज़ोर ग्रहों का बनाया योग ऐसे दो साझेदारों जैसा है जिनके पास पूँजी ही नहीं है।
- कहीं वे सूर्य के बहुत पास जलकर बैठे तो नहीं हैं, या ऐसी राशि में तो नहीं हैं जहाँ उनका बल कम होता है।
- वही ग्रह आपकी कुंडली में कोई कठिन भाव भी तो नहीं चला रहे।
- और वे बैठे कहाँ हैं। बारहवें भाव में बना योग और दसवें भाव में बना योग एक जैसे नहीं होते।
जो औज़ार आपको गिनती देकर चुप हो जाता है, वह आसान सवाल का जवाब दे रहा है, आपके सवाल का नहीं।
फल मिलता कब है
यही वह हिस्सा है जो दो बार पढ़ने लायक है।
परंपरा मानती है कि ग्रह अपना फल मुख्य रूप से अपनी महादशा में देता है, और उसके भीतर उन ग्रहों की अंतर्दशा में जिनसे उसका संबंध है। मान लीजिए नौवें और दसवें भाव के स्वामियों ने योग बनाया है। तो वह योग तभी सामने आता है जब उन्हीं दोनों में से किसी की दशा चल रही हो। बाकी समय वह कुंडली में मौजूद तो रहता है, पर आगे नहीं आता।
इसीलिए ऐसा होता है कि किसी की कुंडली में अच्छा राज योग है और तीस से चालीस की उम्र संघर्ष में निकल जाती है। उस समय किसी और ही ग्रह की दशा चल रही होती है, जिसका इस योग से कोई लेना देना नहीं।
तीन बातें इस समय को तय करती हैं।
किसकी दशा चल रही है। महादशा जीवन के लंबे हिस्से का रंग तय करती है और उसके भीतर की अंतर्दशा महीनों का।
दशा का स्वामी दे भी सकता है या नहीं। जो ग्रह खुद कमज़ोर है या साथ में कोई कठिन भाव भी चला रहा है, वह अच्छे योग के बावजूद मिलाजुला फल देता है। दशा दरवाज़ा खोलती है, क्षमता नहीं बनाती।
ऊपर से शनि और गुरु कहाँ चल रहे हैं। परंपरा में इनके गोचर को कारण नहीं, संकेत माना जाता है। दशा जिस बात की संभावना बनाती है, वह अक्सर तब सामने आती है जब इनमें से कोई किसी ज़रूरी भाव से गुज़रता है।
एक बात साफ़ कह दूँ। तारीख़ कोई नहीं बता सकता। जो कहे कि फलाँ मंगलवार से आपका राज योग शुरू हो जाएगा, वह ऐसा भरोसा बेच रहा है जो परंपरा में है ही नहीं। एक ईमानदार विश्लेषण इतना बता सकता है कि कौन सा समय खुल रहा है, किस विषय में खुल रहा है, और उसके लिए आपको क्या तैयारी करनी चाहिए।
आज के ज़माने में राज योग का मतलब
ग्रंथ राजाओं और दरबारों के समय में लिखे गए, इसलिए उनकी भाषा राज्य और मंत्री की है। उसे अक्षरशः पढ़ लीजिए तो बात हास्यास्पद हो जाती है, और वहीं से करोड़पति बनने वाले वादे निकलते हैं।
समझदारी से पढ़िए तो राज योग का अर्थ है, आदमी जहाँ से चला था उससे ऊपर पहुँचना। घर में पहला व्यक्ति जो पढ़कर नौकरी में आया। छोटा काम जो सचमुच का व्यापार बन गया। ऐसी ज़िम्मेदारी जो बिना लड़े मिल गई। जीवन में यह अक्सर ऐसा दशक होता है जो जहाँ से शुरू हुआ था, वहाँ ख़त्म नहीं होता। आसमान से पैसा गिरना इसका मतलब कभी नहीं रहा, और आज तक कोई कुंडली मैंने ऐसी नहीं देखी जिसने मेहनत की ज़रूरत ख़त्म कर दी हो।
अपनी कुंडली के योग और उनकी दशाएँ साथ में रखकर देखनी हों तो विस्तृत रीडिंग इसी काम के लिए है। नीच भंग राज योग अलग विषय है, उस पर अलग लेख पढ़िए।
जो सवाल लोग पूछते हैं
कुंडली में कितने राज योग होने चाहिए? गिनती से कुछ तय नहीं होता। दो मज़बूत और अच्छी जगह बैठे ग्रहों से बना एक योग, कमज़ोर ग्रहों से बने छह योगों से ज़्यादा काम करता है। और जिस कुंडली में शास्त्रीय राज योग एक भी न हो, वह भी एक अच्छा और स्थिर जीवन दे सकती है।
क्या राज योग बिना फल दिए रह सकता है? हाँ, और यह बात ग्रंथों में ही लिखी है। योग बनाने वाले ग्रह कमज़ोर हों, सूर्य के पास जल गए हों, व्यय भाव में बैठे हों, या उनकी दशा बचपन में या बहुत बुढ़ापे में पड़ रही हो, तो योग बिना दिखे निकल सकता है। यह बहाना नहीं है, नियम का हिस्सा है।
राज योग देखने के लिए जन्म समय कितना सही होना चाहिए? बहुत सही होना चाहिए। ये सारे योग भावों के स्वामित्व पर टिके हैं और लग्न लगभग हर दो घंटे में राशि बदल लेता है। एक घंटे की गड़बड़ी से भावों के स्वामी ही बदल जाते हैं। गलत समय से निकला राज योग छोटी गलती नहीं है, वह दूसरी ही कुंडली है।
इस लेख में जिनकी बात हुई
अपनी कुंडली में यही देखना है?
हर कुंडली अलग होती है। अपनी कुंडली मुफ़्त बनाइए, या सीधे मैसेज करके पूछ लीजिए।